नेपाल में राजनीतिक संकट आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं, जनता में असंतोष बढ़ रहा है और विपक्ष द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री ने इस्तीफा देकर यह संकट और गहरा कर दिया। सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उन्होंने देश छोड़ दिया, जिससे पूरे नेपाल में अस्थिरता फैल गई। आइए विस्तार से समझते हैं कि नेपाल में राजनीतिक संकट कैसे शुरू हुआ, प्रधानमंत्री ने इस्तीफा क्यों दिया और वे किन परिस्थितियों में विदेश गए।
राजनीतिक अस्थिरता की पृष्ठभूमि
नेपाल में राजनीतिक संकट की जड़ें पिछले कई वर्षों से मौजूद थीं। गठबंधन सरकारों में आपसी मतभेद, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं ने देश की स्थिति को कमजोर कर दिया। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व में बनी सरकार पर महँगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट और आर्थिक कुप्रबंधन जैसे आरोप लगे।
जनता का विश्वास धीरे‑धीरे टूटता गया और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। छात्र संगठन, कर्मचारी संघ और आम नागरिक सड़कों पर उतर आए। विपक्ष ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दी। ऐसे माहौल ने नेपाल में राजनीतिक संकट को और गंभीर बना दिया।
इस्तीफे का कारण
प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि बढ़ते विरोध, समर्थन की कमी और प्रशासनिक दबाव ने सरकार चलाना असंभव कर दिया। उन्होंने कहा कि वे देश में शांति बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए इस्तीफा देना ही एकमात्र रास्ता था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में राजनीतिक संकट केवल आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता संघर्ष और नेतृत्व की कमी भी इसका बड़ा कारण है। सहयोगी दलों का समर्थन वापस लेना और विपक्ष द्वारा लगातार हमले करना प्रधानमंत्री की मजबूरी बन गया।
विदेश जाने की मजबूरी
इस्तीफा देने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने सुरक्षा का हवाला देकर विदेश जाने का फैसला किया। विरोध प्रदर्शनों के दौरान उनकी सुरक्षा खतरे में थी। कई जगह उनके पुतले जलाए गए और प्रदर्शनकारियों ने उनके खिलाफ नारे लगाए।
इस स्थिति ने नेपाल में राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया। देश में असंतोष के चलते प्रधानमंत्री ने अपने परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विदेश जाना उचित समझा। हालांकि आधिकारिक तौर पर उन्हें चिकित्सा और सुरक्षा कारणों का हवाला दिया गया, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता इसकी असली वजह मानी जा रही है।
जनता की प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री के इस्तीफे से आम नागरिकों की प्रतिक्रिया दो हिस्सों में बंटी हुई है।
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विरोध प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया।
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सरकारी समर्थकों ने इसे विपक्ष की साजिश करार दिया।
नेपाल में राजनीतिक संकट को लेकर सोशल मीडिया पर बहस चल रही है। कुछ लोग इसे शासन की विफलता मानते हैं, जबकि अन्य इसे अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और दलगत राजनीति का नतीजा बताते हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
दक्षिण एशिया सहित दुनिया के कई देशों ने नेपाल में राजनीतिक संकट पर चिंता जताई है। भारत, चीन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने शांति बनाए रखने की अपील की है। कई देशों ने नेपाल को आर्थिक मदद देने का प्रस्ताव भी रखा है ताकि संकट के समय नागरिकों की मदद की जा सके।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे नेपाल की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बताया है।
समय-रेखा (Timeline)
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1 सितंबर 2025 – महँगाई और बेरोज़गारी को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू।
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3 सितंबर 2025 – विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की।
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5 सितंबर 2025 – प्रधानमंत्री ने शांति बनाए रखने के लिए इस्तीफा देने का संकेत दिया।
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7 सितंबर 2025 – प्रधानमंत्री ने आधिकारिक रूप से इस्तीफा दिया।
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8 सितंबर 2025 – सुरक्षा कारणों का हवाला देकर विदेश रवाना।
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9 सितंबर 2025 – अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेपाल की स्थिति पर बयान जारी।
इस समय-रेखा से स्पष्ट होता है कि नेपाल में राजनीतिक संकट एक दिन में नहीं, बल्कि कई वर्षों की समस्याओं का नतीजा है।
आगे क्या होगा?
अब नेपाल की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। अंतरिम सरकार, जल्द चुनाव, और राजनीतिक गठबंधन की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी दल राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे तो नेपाल में राजनीतिक संकट से बाहर निकला जा सकता है।
लेकिन यदि व्यक्तिगत स्वार्थ हावी रहा तो संकट और गहरा सकता है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी से आगे बढ़ना होगा।
निष्कर्ष
नेपाल में राजनीतिक संकट आज देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। प्रधानमंत्री का इस्तीफा और विदेश जाना केवल राजनीतिक अस्थिरता की शुरुआत नहीं, बल्कि एक गहरे संकट का संकेत है। जनता का भरोसा टूट चुका है और देश के सामने स्थिर नेतृत्व की चुनौती है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि नेपाल किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या राजनीतिक दल मिलकर देश को एक नई दिशा दे पाएँगे।
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