काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की, जबकि भारत में हुई उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों की गैरमौजूदगी को तालिबान ने गलती बताया।

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काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की

काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की: उम्मीदें, विरोध और विवाद

अफ़ग़ानिस्तान में जब से तालिबान सत्ता में आया है, तब से महिलाओं के अधिकारों पर लगातार बहस और चिंता बनी हुई है। लेकिन हाल ही में एक घटना ने सभी का ध्यान फिर से अफ़ग़ान राजनीति की ओर खींचा — काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की
अफ़ग़ान विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताकी और कुछ महिला प्रतिनिधियों की यह मुलाकात चर्चा का विषय बन गई है। यह मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन पर भारी पाबंदियाँ लगी हुई हैं।


🔹 महिलाओं की मुलाकात का उद्देश्य

जब काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की, तो उन्होंने शिक्षा, काम और समाज में महिलाओं की भूमिका पर खुलकर बात की। रिपोर्ट्स के अनुसार, महिला प्रतिनिधियों ने मुत्ताकी से कहा कि अफ़ग़ान समाज की प्रगति तभी संभव है जब महिलाओं को समान अवसर और अधिकार मिलें।
मुत्ताकी ने इस मुलाकात में आश्वासन दिया कि सरकार महिलाओं की चिंताओं को समझती है और “इस्लामी ढाँचे” में उनके अधिकारों की रक्षा करेगी। हालांकि, आलोचक कहते हैं कि ऐसे बयान पहले भी दिए गए हैं लेकिन जमीनी हक़ीक़त नहीं बदली।


🔹 महिलाओं की आवाज़ बन रही है मज़बूत

काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की — यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि एक प्रतीक है। यह दर्शाता है कि तालिबान शासन में भी महिलाएँ अपनी आवाज़ बुलंद करने की कोशिश कर रही हैं।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की मुलाकातें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के बिना संभव नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र और कई यूरोपीय देशों ने बार-बार अफ़ग़ान सरकार से महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने की अपील की है।


🔹 भारत में प्रेस कॉन्फ्रेंस पर विवाद

दिलचस्प बात यह है कि इसी समय, मुत्ताकी भारत यात्रा पर भी थे, जहाँ उनकी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों की अनुपस्थिति ने विवाद खड़ा कर दिया।
जब काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की, वहीं दिल्ली में उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक भी महिला पत्रकार को शामिल नहीं किया गया।
इस दोहरे व्यवहार पर कई भारतीय नेताओं और पत्रकार संगठनों ने सवाल उठाए कि अगर मुत्ताकी महिलाओं से संवाद करने को तैयार हैं, तो भारत में महिला पत्रकारों को क्यों बाहर रखा गया?

विदेश मंत्रालय ने सफाई दी कि इस प्रेस मीट के आयोजन की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान प्रतिनिधिमंडल की थी और भारत का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं था।
फिर भी, यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि अफ़ग़ानिस्तान की महिला-नीति अभी भी अस्पष्ट और सीमित है।


🔹 अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

जब दुनिया ने सुना कि काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की, तो इसे एक सकारात्मक संकेत माना गया।
अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के कई प्रतिनिधियों ने कहा कि यह अफ़ग़ान महिलाओं की हिम्मत और बदलाव की चाह का प्रतीक है।
लेकिन साथ ही, उन्होंने तालिबान से यह भी कहा कि केवल मुलाकातें नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत सुधार ज़रूरी हैं — जैसे लड़कियों के लिए स्कूल खोलना, महिलाओं के रोजगार पर लगी पाबंदियाँ हटाना, और उन्हें शासन-प्रशासन में समान स्थान देना।


🔹 महिला अधिकारों की सच्चाई

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति आज भी बेहद कठिन है।

  • स्कूलों में लड़कियों की पढ़ाई माध्यमिक स्तर तक ही सीमित है।

  • अधिकांश सरकारी नौकरियों में महिलाएँ शामिल नहीं हो सकतीं।

  • सार्वजनिक स्थानों पर उनके पहनावे और आवाजाही पर कड़ी पाबंदी है।

इस पृष्ठभूमि में जब काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की, तो यह घटना उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आई।
यह मुलाकात उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो संघर्ष के बावजूद अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही हैं।


🔹 क्या यह बदलाव की शुरुआत है?

यह सवाल अभी बाकी है कि क्या यह मुलाकात वास्तव में तालिबान की सोच में बदलाव का संकेत है या फिर एक “राजनीतिक प्रदर्शन”?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक अफ़ग़ान सरकार शिक्षा और रोज़गार में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित नहीं करती, तब तक इस मुलाकात का असर सीमित रहेगा।

भारत जैसे देशों के लिए भी यह अवसर है कि वे अफ़ग़ानिस्तान के साथ कूटनीतिक संबंधों में “महिला अधिकारों” को एक प्रमुख मुद्दे के रूप में रखें।


🔹 निष्कर्ष

अंततः, काबुल में महिलाओं ने मुत्ताकी से मुलाकात की — यह एक छोटी मगर प्रभावशाली पहल है।
इस मुलाकात ने यह साबित किया कि अफ़ग़ान महिलाएँ अब चुप नहीं रहेंगी। वे अपने हक़, अपनी शिक्षा, और अपने भविष्य के लिए आवाज़ उठाना जानती हैं।
भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वह इन महिलाओं के साथ खड़ा रहे और तालिबान शासन पर दबाव बनाए रखे ताकि यह मुलाकात केवल प्रतीक न रहे, बल्कि बदलाव की शुरुआत बने।

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